कारोबारी राजा सरावगी के खिलाफ पुलिस कार्यवाही घोर संदेह के घेरे में

खुद कटघरे में विवेचना अधिकारी और आधा दर्जन वर्दीधारी
गिरफ्तारी और जब्ती के समय आमजनों की गवाही से की परहेज
विवेचना अधिकारी नहीं बता सके, जब्त किये गये कट्टे की भौगोलिग दशा
घटना के समय बंद हो गये थे सभी निजी और सरकारी सीसीटीव्ही कैमरे

(Amit Dubey-8818814739)
शहडोल। 11 अप्रैल को भोपाल के डीव्ही मॉल की पॉर्किंग से बुढ़ार पुलिस ने एमपी नगर भोपाल की पुलिस के सहयोग से राजा सरावगी को गिरफ्तार किया था, लगभग 40 दिन जेल में रहने के बाद 21 मई को राजा सरावगी को जमानत मिली और वे जेल से बाहर आये, तब से अब तक बुढ़ार स्थित न्यायालय में मामला विचाराधीन रहा और मंगलवार को दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की जिरह सुनने के बाद माननीय न्यायाधीश ने राजा सरावगी को इन आरोपों से बरी कर दिया। राजा सरावगी की ओर से अधिवक्ता समीर अग्रवाल और यासिर कैफे ने पैरवी की, अधिवक्ताओं ने बताया कि इस मामले में माननीय न्यायाधीश ने अपना फैसला सुनाते हुए पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही को संदिग्ध और घोर संदेह जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। पुलिस ने राजा सरावगी के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294, 506, 336, 307, 34 व आयुध अधिनियम 1959 की धारा 25 (1-बी) (ए) और 27 सहित भादवि की धारा 75 के तहत अपराध कायम कर आरोप पत्र दाखिल किया था, इन सभी धाराओं से उन्हें बरी कर दिया गया।
यह थी शिकायत
22 मार्च की शाम 7 से 8 बजे राजा सरावगी ने दादू उर्फ रमेश प्रताप सिंह पिता शंकर सिंह को पहले फोन पर धमकी दी और दो गाड़ी में गुन्डे भरकर उसके आफिस गया, जहां फायरिंग की, जिससे ऑफिस का कांच टूट गया और अफरा-तफरी का माहौल बन गया। उस समय दादू सिंह कार्यालय में नहीं था, फोन पर उसेे सूचना मिली तो अनिल गुप्ता, अर्जुन वर्मा, पवन चौधरी को थाने जाकर शिकायत करने को कहा, घटना कारित कर राजा सरावगी, बद्री पाण्डेय, कल्लन जैन उल्टा थाना रिपोर्ट करने पहुंचे थे, जब कर्मचारी वहां पहुंचे तो उन्होंने बाहर से ही डांटकर भगा दिया, अगले दिन 23 मार्च को पुलिस महानिरीक्षक को घटना की शिकायत देते हुए कार्यवाही की मांग की गई।
7 दिन बाद मिला कारतूस का खोखा
पुलिस महानिरीक्षक द्वारा 23 मार्च को ही एसडीओपी धनपुरी को मामले की जांच दी गई, लेकिन मामला ठण्डा रहा, पुलिस के विवेचना रिकार्ड बताते हैं कि थाने के ठीक पीछे चली गोली की उसे खबर तक नहीं लगी, घटना स्थल पुलिस कालोनी से सटा और थाने से महज 300 मीटर दूर है, 23 मार्च को आईजी ने जब जांच के आदेश दिये, जिसके 5 दिन बाद विवेचना अधिकारी विजय सिंह पाटले घटना स्थल पर पहुंचे और उन्होंने कारतूस-खोखा आदि जब्त किया।
अचानक बंद मिले सभी कैमरे
घटना स्थल के आस-पास और थाने में लगे सीसीटीव्ही कैमरे जो घटना के समय राजा सरावगी व अन्य के थाने या फिर घटना स्थल पर रहने की पुष्टि करते, सभी कैमरे अचानक कुछ समय या एक दिन के लिए बंद हो गये, बुढ़ार थाने के प्रधान आरक्षक बालेन्द्र प्रताप सिंह ने घटना स्थल के सामने जितेन्द्र सिंघई की किराना दुकान और पेट्रोल पंप सहित आस-पास लगे सीसीटीव्ही कैमरे की जांच की तो उस समय सभी कैमरे बंद पाये गये। यही नहीं मजे की बात तो यह है कि घटना के समय बुढ़ार थाने में लगे कैमरे भी बंद पाये गये थे, पुलिस ने अपनी डॉयरी में इस आशय का एक पत्र जो 12 अप्रैल को रेडियो शाखा शहडोल को भेजा गया था, वह भी मामले को गंभीर रूप देने के नीयत से शायद संलग्न किया गया था।
गवाही में सिर्फ वर्दीधारी ही शामिल
पुलिस ने राजा सरावगी को एमपी नगर भोपाल की डीव्ही मॉल की पार्किंग से गिरफ्तार होना बताया है, गिरफ्तारी के दौरान भीड़ भरे इलाके में पुलिस को कोई भी सामान्य व्यक्ति नहीं मिला, विवेचना अधिकारी विजय सिंह पाटले के साथ एमपी नगर पुलिस के हेमंत रघुवंशी और भगवान दास के साथ देवलोंद थाने में पदस्थ धीरेन्द्र भदौरिया व उदय रावत आदि शामिल रहे। यही नहीं भोपाल से बुढ़ार लाकर जब पुलिस ने कट्टे और कारतूस की बरामदगी दिखाई, उस दस्तावेज में भी पुलिस को कोई स्थानीय व्यक्ति नहीं मिला। उस पंचनामें में भी सिर्फ धीरेन्द्र भदौरिया और उदय रावत के हस्ताक्षर थे।
ट्रांजिट रिमाण्ड नियमों को भूले वर्दीधारी
11 अप्रैल को भोपाल में राजा सरावगी की गिरफ्तारी करने के बाद पुलिस ने उसे भोपाल में ही माननीय न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत कर ट्रांजिट रिमाण्ड में लिया, आरोपी की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता समीर अग्रवाल ने बताया कि नियमत: पुलिस को ट्रांजिट रिमाण्ड में लेने के बाद सीधे बुढ़ार न्यायालय में लाकर पेश करना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया, भोपाल से आने के बाद दस्तावेजों में कट्टे और कारतूस की जब्ती होना दिखाया और उसके बाद उसे न्यायालय में पेश किया गया, जो अत्याधिक अविश्वसनीय और घोर संदेह के दायरे में आता है।
राजा ना कहते रहे, पाटले कागज गोदते रहे
पुलिस द्वारा न्यायालय के समक्ष आरोपी के साथ प्रस्तुत किये गये दस्तावेजों पर गौर करें तो साफ नजर आता है कि पुलिस ने इस मामले में खुद स्क्रिप्ट लिखी और बैठे-बैठे ही पूरा घटना क्रम रच दिया, पुलिस द्वारा प्रस्तुत किये गये धारा 27 साक्ष्य अधिनियम के मेमोरेंडम में खुद उल्लेख किया कि जिस रिवालवर से मैनें (राजा सरावगी) फायर किया, उसे शहडोल रोड वाले बाड़े में रखा हूं, चलो-चलकर बरामद करवा देता हूं, हालाकि उक्त प्रपत्र के नीचे आरोपी के हस्ताक्षर क े स्थान पर हस्ताक्षर करने से इंकार किया, लिखा है, यही नहीं बिना हस्ताक्षर और बयान वाले मनमाने पत्र को विजय सिंह पाटले और थाना प्रभारी अनिल पटेल ने आगे बढ़ाते हुए राजा सरावगी की निशानदेही पर 2 नग जिंदा कारतूस और एक कट्टा राजा उपवन में लगे लिप्टिस पेड़ के पास पत्थर के नीचे से जब्ती करना भी दिखा दिया और नीचे फिर पूर्व की तरह आरोपी ने हस्ताक्षर करने से मना किया, का उल्लेख किया।
खुद की कार्यवाही में फंसे पाटले
सूत्रों पर यकीन करें तो न्यायालय में जिरह के दौरान जब अनुसंधानकर्ता विजय सिंह पाटले से राजा उपवन और उसके अंदर की भौगोलिग दशा के संदर्भ में पूछा गया तो जवाब की जगह वे बगले झांकते नजर आये। यही नहीं यह बात भी सामने आई कि विजय सिंह पाटले सहित भोपाल में गिरफ्तारी में शामिल एमपी नगर पुलिस और देवलोंद पुलिस सहित अन्य पुलिसकर्मियों में कोई भी पूर्व से राजा सरावगी को चेहरे से नहीं पहचानता था, बावजूद इसके राजधानी में लाखों लोगों के बीच संवेदनशील और देश भक्ति और जनसेवा की शपथ लेकर आये वर्दीधारियों ने चमत्कार दिखाते हुए राजा सरावगी को डीव्ही मॉल के पार्किंग में न सिर्फ पहचान लिया, बल्कि गिरफ्तार भी कर लिया।

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