सावधान: भूलकर भी न जाना अपोलो हॉस्पिटल

Ajay Namdev-7610528622

लापरवाही के साथ मल्टी स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में बनते है लाखों के बिल

2015 की दूसरी सबसे अधिक कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्म Óगब्बर इज बैकÓ देखने के बाद लोगों की आखे खुली की खली रह गई, मल्टी स्पेशिएलिटी हॉस्पिटलो में ईलाज के नाम पर किस तरह से लूट की जाती है फिल्म के माध्यम से दिखाया गया था, उसके बाद भी लूट का सिलसिला आज भी बंद नही हुआ। फिल्म की कहानी में गंभीर रूप से घायल न होने के बाद भी डॉक्टर उसे महंगे परिक्षण करने को कहते है इसे देखकर उसे अनुभव होता है कि डॉक्टर के सामने गरीब लोग कितने विवश होते हैं।

अनूपपुर। अस्पताल में अब जान बचाने का काम कम, लेने का काम ज्यादा होता दिखता है, कभी लापरवाही की शक्ल में मरीज दम तोड़ते हैं तो कभी मोटे इलाज के बिल देख कर। ऐसा ही मामला एक बार फिर बिलासपुर स्थित आपोलो हॉस्पिटल में देखने को मिला, जबकि मरीजों के उपचार में मानवता का भाव होना जरूरी है और यह अस्पतालों की जिम्मेदारी है। निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों के साथ किस तरह से लूट की जा रही है, इसको लेकर कई रिपोर्ट भी सामने आ चुके है। दवाओं समेत अन्य मेडिकल उपकरण भारी हेराफेरी करके कई फीसदी ज्यादा का मुनाफा कमा रहे हैं। ये निजी अस्पताल एक रुपये में खरीदे गए सामान को चार गुने दर पर बेच रहे हैं। इसी तरह से जांच और दवाओं पर भी कई फीसदी तक का मुनाफा वसूला जाता है।
यह है मामला
22 जुलाई की सुबह 8 बजे अनूपपुर जिले मे निवास करने वाले एक किसान को सर्प काट देता है, जिसके बाद उसके परिजन प्राथमिक उपचार के लिए जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया, जहां सांय 5 बजे तक उसका ईलाज चला, मरीज की स्थिति बिगडता देख उसे रात्रि में आपोलो बिलासपुर में भर्ती कराया गया, जहां 5 दिन तक मरीज की ईलाज करने के बाद 57 हजार का बिल बनता है, उसी दिन शाम को चिकित्सकों ने कह दिया कि अब किडनी में इन्फेक्सन है और मरीज का डायलिसिस करना पडेगा, परिजन मना करते है तभी कुछ देर बाद एक अन्य चिकित्सक समझाने के लिए आते है कि इस गंभीर समस्या का तत्काल इलाज करना जरूरी है नही तो और बढता जायेगा, जिसे सुन परिजनों ने चिकित्सक की बात मान ली और डायलिसिस के लिये जारी हो जाता है।
सातवें दिन लाखो का बिल
मरीज के डायलिसिस की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद सातवें दिन एक व्यक्ति आता है और बिलिंग काउटर में जाकर अपना बिल पूछ लेने को कहता है, जबकि दो दिन पहले ही बिल का भुगतान परिजनो द्वारा कर दिया गया था। फिर भी जब परिजन बिलिंग काउंटर पर अपना बिल पूछने पहुंचा तो उन्होने एक लाख बीस हजार का बिल होना बताया, सुनते ही परिजन के सांसे बढ गई। मामला इतने में ही नही रूका और अगले दिन फिर डायलिसिस करना आवश्यक बताया तो फिर प्रक्रिया शुरू की गई और बिल एक लाख चालीस हजार पहुंच गया। जिसके बाद परिजनों ने अनावश्यक बिल लेकर डाक्टर के पास पहुंचे तो डाक्टर के द्वारा बिलिंग मैनेजर से कुछ कम करने को कहा जाता है और दस हजार रूपए बतौर मानवता कम कर दिया जाता है। ऐसे ही अन्य मरीज जो कैश पेमेंट में भर्ती होते है उनके साथ भी किया जाता है।
आये दिन होती लूट
महंगे पांच सितारा प्राइवेट अस्पतालों में होती आए दिन की लूटखसोट का यह पहला या आखिरी मामला नहीं है, बल्कि ऐसा हर समय देश में कहीं न कहीं हो रहा होता है और डाक्टरों को लुटेरा व हत्यारा तक कहने में लोगों को कोई संकोच या ग्लानि महसूस नहीं होती। लोग महंगे अस्पतालों में जा कर लुट रहे हैं तो कोई भी यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि आखिरकार लोग वहां इलाज के लिए जाते ही क्यों हैं, यह एक संवेदनशील बात है जो सच के करीब लगती है, लेकिन इस का सीधा संबंध सरकार से भी है जो शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेह होती है।
पिसता आम आदमी
बड़े अस्पतालों की लागत और खर्च भी ज्यादा होते हैं और वे सरकार को टैक्स भी ज्यादा देते हैं और तमाम बड़े नेता व अफसरों का लगभग मुफ्त के भाव इन में इलाज होता है, सच यह है कि सरकार के निकम्मेपन के चलते पिछले 20 सालों से ब्रैंडेड अस्पताले खूब फल-फूल रही है, जिन में निचुड़ता आखिरकार आम आदमी ही है। पर हर जगह ऐसा नहीं होता, वजह, स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफाखोरों के हवाले करने की जिम्मेदार सरकार लूटखसोट पर अंकुश लगाने के लिए कोई पहल नहीं करती। अस्पतालों में दवाओं के दाम अलग-अलग हैं, सेवाओं की फीस अलग-अलग हैं, और इस के बाद भी कोई मरीज अगर लापरवाही के चलते मर जाए तो प्राइवेट अस्पतालों को आमतौर पर कोई सजा नहीं होती, इन सवालों के जवाब आंकड़ों से गिनाए जाएं तो समझ आता है कि सरकार की नीतियां भी कम दोषी या जिम्मेदार नहीं।
पांच दिन बाद कैसे हुआ किडनी में परेशानी
अपोलो बिलासपुर में 5 दिन से भर्ती मरीज का परीक्षण व ईलाज मंहगी दर पर हो रहा था, सुबह व शाम डाक्टर राउन्ड पर आते है और बाकी समय नर्स मरीज की देखभाल करते है, कहा जाये तो 24 घंटे मरीज को चिकित्सकीय सुविधा मिलती है, इसके बावजूद भी 6वें दिन अचानक किडनी का क्रिएटनिन लेवल 9 पहुंच जाता है और उपचार के लिए मरीज के पास सिर्फ डायलिसिस की प्रक्रिया ही बच पाता है, जाहिर सी बात है एक दिन में किसी मरीज का किडनी सिर्फ लापरवाही के कारण ही खराब हो सकती है। डाक्टरो की लापरवाही के कारण मरीज गंभीर परिस्थिति में जीने को विवश है।

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