सतनाम पंथ के प्रवर्तक संत शिरोमणि बाबा गुरू सतगुरू घासीदास का अमृत वचन

सतनाम पंथ के प्रवर्तक संत शिरोमणि बाबा गुरू सतगुरू घासीदास का अमृत वचन

अवइया ला रोको नही, जवइया ला टोको नही

मनुष्य मेहमान है, आता है और चला जाता है, कर्म का परिणाम शेष रहा जाता है 

 सतनाम पंथ के प्रवर्तक प्रकृति के पुजारी संत शिरोमणि बाबा गुरूजी घासीदास जी के आदर्शो पर आधारित मानवता का संदेश देने के लिए 31 दिसंबर तक चलने वाले गुरूपर्व पर संत पुनीराम गुरूजी के द्वारा गुरूवाणी को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, जहां सत्य और मानवता से परिपूर्ण ज्ञान का प्रकाशमयी दीपक जलाया जा रहा है।

बिलासपुर । सतगुरू घासीदास का कथन है कि जो आपके घर आते है उन्हें मत रोको आने दों, उन्हें रोकना नही चाहिए, यदि वह पुन: जाना चाह रहा हो तो उसे कभी भी रोकना नही चाहिए। इसलिए कि वह जाने का मन बना लिया है वह रहना नही बल्कि जाना चाहता है उसे उसके स्वेच्छानुसार जाने देना चाहिए। यदि जाने वाले को आप रोकते है तो वह तुम्हारे लिए अडचन पैदा करेगा, क्योकि उसका मन रहने का नहीं है। वह नहीं चाहता कि आपसे सच्चे मन से मिलू आपसे चर्चा करूं वह आपका सच्चा साथी नही है। रूकने वाला आपसे मिलना चाहता है आपके प्रति उसका लगाव श्रध्दा प्रेम है। आप पर विश्वास प्रदर्शित करता है लेकिन जाने वाले का आपके प्रति कोई लगाव और विश्वास नही है। जो जन्म लेकर आता है उसे रोकना नहीं चाहिए पता नहीं वह कब तक के लिए आपके घर मेहमान बनकर आ रहा है कब तक रहेगा आने वाला को भी पता नही है।

जो कमाता है वही देकर जाता है

जब तक प्रेम में बंधा रहेगा तब तक परिवार से प्रेम रहेगा और जब जाने का समय होगा तो आपके प्रति लगाव और प्रेम समाप्त हो जायेगा, वह अपने जाने की तैयारी कर लिया है, इसलिए वह माया मोह को त्यागकर आप से अलग रहना चाहता है। यदि उसे आप बलपूर्वक रोकना चाहोगे तो भी वह रूकने वाला नही है। जब आदमी कही जाता है तो वह योजना बनाकर चलता है कि उसे कब तक रहना है और क्या-क्या काम करना है किसी का काम पूरा होता है किसी का पूरा नही होता है कोई उस स्थान तक पहुॅच पाते भी है और कोई पहुॅच भी नही पाते। जिसका सोच विचार और सोच अच्छा नही रहता वह समय को टाल कर चला जाता है। कुछ केवल लेने आते है बदनाम होकर जाते है लेकिन कुछ देने आते है वे मेहनत करते है और मानव समाज को देकर जाते है। जिनके पास कमाया हुआ रहेगा वही तो देकर जायेगा। यह धरती कर्म भूमि है जो कमाया है उसका नाम यह मातृभूमि धरोहर के रूप में रखता है और उस कर्मठ आदमी का नाम अमर कर देता है और जो दूसरे का कमाई खाता है उसका भी नाम पहिचान के लिए धरोहर के रूप में अमर कर देता है। अमर तो दोनो प्रकार के आदमी होते है जो मानव समाज में जन्म लेकर अति अन्याय करे और सबको सताये उसका नाम भी अमर रहता है, लेकिन वह सबसे गाली खाता है उसको मरने के बाद में धिक्कारते है उसके नाम को घृणा की दृष्टि से देखते भी है और उसको नकारते भी हैं।

मनुष्य आता है और चला जाता है 

एक आदमी मानव समाज के लिए काम किया है, जिसकी शिक्षा सबके लिए समान है, सब श्रध्दा प्रेम और आस्था से उसे स्मरण करते हैं, सबके लिए आदरणीय और ईष्ट देव की तरह है। इस धरती में आना तो दोनों का एक ही रास्ता से हुआ है और इस धरती में रहने और कर्म करने का एक ही जमीन मिला है, परन्तु एक को न्यायी और दूसरे को अन्यायी की तरह देखा जाता है। मनुष्य मेहमान है आता है और चला जाता है उसके कर्म का परिणाम उस धरती में शेष रहा जाता है वही प्रतीक है, पहचान है, उस मेहमान का जिसे लोग अपने घर में और घर में रहने के लिए स्थान देते है और दूसरा वह है जिसे आंगन मे आने पर भगा दिया जाता है। आने वाले को कोई रोकने का आधार हमारे पास नहीं है और जाने वाले को रोकने का साधन नहीं है। इसलिए दोनों आते है और दोनो चले जाते है। गुरु घासीदास कहते है कि आने वाले को मत रोको और जाने वाले को मत टोको अर्थात रोकने का प्रयास मत करो वह रूकने वाला नही है। मनुष्य आता है और चला जाता है आपका कोई प्रयास काम आने वाला नही ह,ै इसलिए उन्हीं को स्वतंत्र छोड़ दो आने वाले आये और जाने वाले जाये आप और हम केवल दर्शक है प्रकृति का नियम परमात्मा जाने हमको जो हक्क दिया है वह केवल आने वाले और जाने वाले दोनो का स्वागत करना है।

सतगुरू का दूसरा संदेश

सतगुरू घासीदास का दूसरा संदेश है कि जे ज्ञान दिही ते ज्ञानी, जे निंदा करही ते अभिमानी। ज्ञानी पुरूष के पास अभिमान नहीं रहता क्यिों कि वह तो सबको समान समझता है उसके पास ईष्या द्वेष राग, छलकपट अहंकार नहीं रहता क्यिो कि जो अपने परिश्रम से कमाया है जो उसका उपज है वह समाज को अपने परिवार समझ कर बाटना चाहता है। ज्ञानी आदमी को परिवार का मुखिया समझना चाहिए क्यिोकि जो घर का मुखिया होता है वह स्वयं कमाता है और अपने परिवार को बिना संकोच किए खिलाता है उन्हें अच्छी शिक्षा देता है मिल जुल कर रहने का संदेश देता है परिवार के लिए किसी प्रकार का ईष्या द्वेष छल कपट नहीं रहता है बल्कि सहयोग सेवा और प्रेम होता है इसलिए ज्ञानी पुरुष के लिए सतगुरू घासीदास ने कहा है कि जे ज्ञान दिही ते ज्ञानी, लेकिन अधिमानी घमंडी चाटुकार धोकेबाज लुटेरा ठग को नकलची को निंदक माना है निंदक आदमी किसी के अच्छाई को देख नही सकता है उसकी बुराई करता है अच्छाई करने का, सेवा करने का अगुआ बनने का नाटक करता है वह आदमी सचमुच में चुगलखोर है जो सत्य को ठुकराता है और स्वयं के नाटकीय क्रियाकलाप को अंधविश्वास को सामने लाकर तरह तरह का नियम बनाता है लोगो को धोखा देता है मसीहा बनने का नाटक करता है इंसान दिखावा ज्यादा करता है ताकि उस दिखावे को लोग देखकर उसकी ओर आकर उसका कहना मानें। निंदा करने वाला इंसान वास्तव में विश्वास योग्य नही होता है वह बाहर से दिखावटी करता है सत कहलाता है वेषभूषा और पोषाक कभी संत का आभूषण नहीं हो सकता है जो उसके पास मुखिया का कोई गुण ही नही है वह मुखिया का रोल कैसे निभायेगा। वह तो सिर्फ मुखिया बनकर अपने अहंकार से नियम बनाकर लुटने का काम करेगा। किसी के दुख सुख की बात वह नही सुनेगा जहाँ पैसा दिखेगा वहाँ वह जायेगा और जहाँ विरान दिखेगा उसकी बात भी वह नहीं करेगा इसलिए तो गुरू घासीदास ने कहा है कि जे ज्ञान दिही ते ज्ञानी, जे निंदा करही ते अभिमानी। पुनीराम की वाणी सतगुरू की पहिचानी है।

ज्ञानी पुरूष प्रकृति के समान है 

वह कोई भी जो ज्ञान देने लायक है उसमें भी सत्य और समानता का है, वह ज्ञानी पुरुष है चाहे वह पुरूष हो या महिला हो ज्ञान तो ज्ञान होता है किसी प्रकार का भेद भाव नही करना चाहिए, क्योकि सत के लिए सब बराबर हैं सत की सृष्टि सबके लिए समान है वह किसी से कोई भेदभाव नहीं करता है। जो भी सच्चा ज्ञान देता है समाज के उत्थान के लिए न्याय के लिए समानता के लिए वह ज्ञान सत पर आधारित होता है वह ज्ञानी माना जायेगा। उस व्यक्ति को श्रध्दा और विश्वास से गुरू मान लेना चाहिए क्यिोंकि उसका ज्ञान सबके लिए समान है जिस तरह है पवन सभी जगह समान रूप से बहती है पानी सबका प्यास बुझाती है आकाश से वर्षा सब जगह होती है वह खेत खलिहान पहाड़ पर्वत नाला और नदियाँ नहीं देखता है ठीक उसी प्रकार से ज्ञानी पुरुष की वाणी बिना भेदभाव की होती है और सबके लिए समान होती है। ज्ञानी पुरूष प्रकृति के समान है, पंचतत्व के समान सबके लिए बराबर है, लेकिन अभिमानी व्यक्ति जो होता है केवल वह अपना हित और कल्याण चाहता है उसका ध्यान और ज्ञान केवल धन बटोरने और सबको अपने कब्जे में रखकर उन पर नियम कानून थोपने के सिवाय कुछ भी नही रहता है उस स्वार्थी व्यक्ति को सतगुरू घासीदास ने निंदा करने वाला और अभिमानी करार दिया है। आप सभी को सतगुरू का सच्चा ज्ञान मिले और अपने आप को अपने अंदर गुरू के पास जाकर उसके सत मार्ग को स्वीकार कर स्वयं अपने शरीर रूपी नाव से भव सागर रूपी समाज से पार उतरने का संकल्प लीजिए ताकि समाज में आपको भी अपना स्थान मिल सके। आप सभी माता पिता भाई बहनों को पुनीराम की ओर से जय सतनाम।

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