क्षेत्र के इतिहास को समेटे हुए है सिंहपुर,बिरसिंहपुर और सिंघवाड़ा के मंदिर में स्थापित देवी प्रतिमाये

बिरसिंहपुर पाली की बिरासिनी माता की छवि दिखती है

अष्टभुजी पिपलेश्वरी देवी की प्रतिमा में

शहडोल। संभाग अपने चारो ओर पुरातात्विक सम्पदा को समेटे हुए है। जो क्षेत्र के गौरवशैली इतिहास को बताती है। समय के साथ भले ही कई ढांचे अब नष्ट होने कि कगार पर पहुंच गए हो , लेकिन जो अब भी शेष बचे अवशेष हुए है वे अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण हैं और इनके संरक्षण के लिए पुरातात्विक विभाग की ओर से सतत प्रयास भी किये जा रहे है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विराट मंदिर, सिंहपुर का किला और पंचमठा मंदिर,लखबरिया की गुफाएं,केशवाही की मरखी माता मंदिर,पाली की बिरासिनी देवी और बांधवगढ़ का किला महत्त्वपूर्ण है और यह सभी इस क्षेत्र के इतिहास को समेटे हुए है। संभागीय मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर नौरोजाबाद के पास सिंहवाड़ा के मंदिर में दुर्लभ अष्टभुजी देवी प्रतिमा स्थापित है जो हूबहू पाली की बिरासिनी माता की प्रतिमा की रिप्लिका है।
समकालीन है तीनो मंदिर
संभागीय मुख्यालय के समीप स्थित सिंहपुर का पचमठा मंदिर अपनी अद्भुत बनावट और ऐतिहासिकता के लिए सम्पूर्ण क्षेत्र में विख्यात है। इसी पचमठा मदिर के समीप स्थित काली मंदिर लोगो की आस्था का केंद्र भी है। मंदिर की प्रतिमा की बनावट काफी हद तक नगर के आसपास स्थापित ऐतिहासिक देवी प्रतिमाओं से मिलती जुलती है। खासतौर पर कंकाली मंदिर स्थित कंकाली माता की प्रतिमा और पाली स्थित बिरासिनी माता की अष्टभुजी प्रतिमा भी इसके समकालीन मानी जाती है। सिंहपुर, बिरसिंहपुर और सिंघवाड़ा के मंदिर में स्थापित देवी प्रतिमाये और गढ़ी आपस में एक इतिहास को समेटे हुए है। अपनी अद्भुत वास्तुकला और बनावट के साथ एक ऐसा मंदिर भी है जहाँ की देवी प्रतिमा को पाली स्थित बिरासिनी माता की प्रतिमा की रिप्लिका कहा जा सकता है ।

बिरासिनी देवी के सामान अष्टभुजी पिपलेश्वरीसंभागीय मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर नौरोजाबाद के पठारी फाटक से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम सिंघवाड़ा में पिपलेश्वरी देवी के नाम से देवी मंदिर स्थापित है। मान्यता है कि यह देवी प्रतिमा पीपल के पेड़ के नीचे से निकली थी जिसके कारण इनका नाम पिपलेश्वरी देवी पड़ गया। अपनी अद्भुत बनावट के लिए विख्यात बिरासिनी देवी की प्रतिमा के सामान ही पिपलेश्वरी देवी की प्रतिमा भी अष्टभुजी है। इसकी बनावट देखने में बिलकुल बिरासिनी देवी की प्रतिमा के समान है। काले पत्थर से बनी इस प्रतिमा की बनावट भी देखने में कलचुरी कालीन है। जो कि पाली बिरासिनी देवी की रिप्लिका ही लगती है।

सिंघवाड़ा में है राम दरबार
सिंघवाड़ा में प्राचीन किले के खँडहर में एक प्राचीन राम मंदिर भी बना हुआ है। सैकड़ो साल पुराने इस मंदिर कि बनावट भी अति प्राचीन है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बने खम्भों में मछलीनुमा आकृति निर्मित है साथ में बाहर एक ओर हनुमान और दूसरी ओर प्राचीन जैन प्रतिमा स्थित है। जिसके कारण यह मंदिर अत्यंत ही भव्य दिखाई देता है।
सिंहपुर जैसा ही सिंघवाड़ा
मंदिर के पुजारी के अनुसार यह किला होल्कर राजाओ ने लगभग 500 साल पहले बनवाया था। जो सिंहपुर की गढ़ी में निवास करते थे। यहाँ मान्यता है कि होल्कर राजाओं ने ही सिंहपुर का किला भी बनवाया था, इसलिए इस जगह का नाम सिंहपुर के जैसा ही सिंघवाड़ा पड़ा। किले की बनावट देखकरयहाँ की भव्यता की अंदाजा स्वत: लगाया जा सकता है। गढ़ी में सीता रसोई और अन्य द्वार भी बने हुए थे लेकिन देखरेख के अभाव में अब इनके सिर्फ अवशेष बचे हुए है। इस मंदिर में बिरसिंहपुर पाली के रानी मोहल्ला की गढ़ी के समान ही निर्मित सभी प्रतिमाये है।
मूर्तियों पर तस्करों की नजर
सिंघवाड़ा के मंदिर में स्थापित प्रतिमाओं की बनावट और इनकी ऐतिहासिक महत्त्व के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इन प्रतिमाओं का मूल्य लाखो में है, जिसके कारण इस मंदिर में मूर्ति तस्करों की नजर भी लगी हुई है। सिंघवाड़ा के किले स्थित मदिर से पहले भी स्फटिक के बने कृष्ण प्रतिमा और एक अन्य प्रतिमा भी चोरी हो चुकी है। शेष अन्य प्रतिमाओं और अवशेषों पर भी चोरो की नजर बनी हुई है। पहले भी मूर्ति तस्करों ने सिंहपुर के मंदिर से भगवान गणेश की प्रतिमा को चोरी कर लिया था। जिसे काफी मशक्कत के बाद बरामद किया गया था ।
आपस में जुड़े हुए है तीनो मंदिर
प्रचीन मान्यताओं और अवशेषों पर नजर डाले तो सिंहपुर का मंदिर , बिरसिंहपुर पाली का मंदिर और सिंघवाड़ा का मंदिर और इन मंदिरों में स्थापित प्रतिमाये और अवशेष समकालीन मने जा सकते है। होल्कर राजाओ की मंदिर बनाने की शैली और गढ़ी का निर्माण इस बात का परिचायक है कि इन मंदिरों से जुडी प्राचीन मान्यताएं सत्य है। लेकिन देखरेख के अभाव में सिंघवाड़ा का मंदिर और गढ़ी आज अत्यंत जर्जर हो चुके है। कई लोग ऐसे भी हैं जो इन मंदिरों के बारे में जानते भी नहीं है जिसके कारण यह क्षेत्र विकास कि दौड़ में पिछड़ गया है। जबकि मंदिर के विकास और देखरेख के लिए बनी समीति के कलेक्टर अध्यक्ष भी है।
चारों तरफ बिखरे हुए हैं अवशेष
जिस समय यह मंदिर बना था उस समय यहां की भव्यता और विशालता की कहानियां आसपास के क्षेत्रों में आज भी काफी प्रसिद्ध हैं। यही वजह है कि आज भी सिंघवाड़ा मंदिर दर्शनीय और लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर की दीवार और दरवाजों पर पत्थर में उकेरी गई नक्काशी को देखकर ही लगता है कि इसे बनाने में काफी समय लगा होगा। मंदिर की प्राचीनता भी इसी बात से समझ में आती है कि यहां जैसी स्थापत्य कला 2000 साल पुराने मंदिरों में ही नजर आती है। लेकिन देखरेख के अभाव में मंदिर और गढ़ी अब खँडहर में तब्दील हो गये है जिसके अवशेष चारो ओर बिखरे हुए है।

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