सांपों से चले सपेरों की जिन्दगी ……

मुफलिसी के शिकार सपेरे बन सकते हैं एक्सपर्ट स्नेक कैचर

@अशोक गर्ग +917974627489

सांप और सपेरों का संबंध सदियों से है। सपेरे सांपों की हर नब्ज पहचानते हैं। बीन की मधुर तान जब डफली की थाप से सुमेलित होती है तो नीरस हृदय भी थिरक उठते हैं । बीन और सांपों के साथ खेलने वाले सपेरों के हृदयहरी संगीत ने ऐसा जादू किया कि सारी दुनिया इसकी दीवानी हो गई। कामनवेल्थ गेम्स जैसे आयोजनो मे भी सपेरों की बीन ने पूरे स्टेडियम को सम्मोहित कर लिया। परंतु बीन का यह लहरा अब चौपालों और कूचों में कहीं सुनाई नहीं देता। शासन ने सपेरों के हाथ बांधे तो इसकी मार उनके पेट पर पड़ी। सांप हाथों से फिसल गए और बीन दीवारों पर टंग गई । पुरातन लोक संस्कृति के इन दूतो की जिंदगी फांको पर आ गई। क्या सांप और सपेरों के अंतरंग संबंधों को नए और वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता ? क्या केरल जैसे राज्यों की तर्ज पर सपेरों को प्रशिक्षित कर उनकी पारंपरिक दक्षता को आधुनिक स्वरूप नहीं दिया जा सकता ? इससे मुफलिशी में जी रहे सपेरों के घर खुशियां लौट आएगी, पर्यावरण को संतुलन, लोगों को सुरक्षा और शासन को नए स्नेक कैचर मिलेंगे।

भोपाल। सिर पर मुरेठा, लंबा चोगे जैसा गाढ़ा कुर्ता, गले में रंग बिरंगे मनको की ढेरों मालाएं, कंधे पर सांप लदे पिटारियो का कांवर और हाथ में लौकी के तुम्मे से बनी बीन की तान छेडते सपेरे गलियों से गुजरते तो लोगों की भीड़ उन्हें घेर लेती । बीन की धुन पर डोलती नागिन लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाती थी । संगीत और फिल्मकारों ने सांप, सपेरो और बीन का इस कदर प्रयोग किया कि सारी दुनिया में नागिन डांस छा गया । सांप के दूध पीने और बदला लेने का आकल्पन हो गया यहां तक कि इच्छाधारी सांप भी प्रकट होने लगे । पूरे उद्योग ने इससे अकूत धन बटोरा परंतु सपेरों के हिस्से में जमीन पर बिछी चादर में पड़े चंद सिक्कों के अलावा कुछ नहीं आया । घर में सांप घुस आए तो साक्षात मौत से सामना हो जाए या तो सांप मारा जाएगा या इंसान । ऐसे में सपेरे देवदूत बनकर आते थे। शाबाशी और इनाम-एकराम पाते थे । इसी बहाने जड़ी-बूटियां और ताबीज भी बिक जाती थी । वन्यजीवों के संरक्षण पर कानून सख्त हुआ और सपेरों के अदिन शुरू हो गए । वर्षों से औलाद की तरह पहले जा रहे सांप पिटारियो से बाहर निकल गए और हाथ में रह गई वो बीन जिसका मोल अब कौडियो के बराबर भी नही।

बसेरा मिले तो हो विकास

जीवन के अनगिनत दुख-दर्द लिए देश भर में भटकने वाले सपेरों का समुदाय सफर का पर्याय बन गया है। इनका ना कोई ठौर-ठिकाना है और ना ही घर द्वार। जीवन में ठहराव और स्थाई बसेरा ना होने के कारण सपेरे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास से कोसों दूर रह गए। खानाबदोश जीवन जी रहे सपेरे व्यापारिक गतिविधियों से लेकर मौखिक इतिहास की परंपरा और कला संस्कृति को व्यापकता प्रदान करते हैं । ये केवल सांप पकड़ने में ही निपुण नहीं होते इन में बहुतायत लकड़ी, लोहे और पत्थरों के कुशल कारीगर भी हैं और कुछ महिलाएं आकर्षक कशीदाकारी भी करती हैं। बस जरूरत है मदद और प्रोत्साहन की । दरअसल सपेरा वह समाज है जिस पर उदारवादी सरकारों ने निगाहें की ही नहीं । इनके पुनर्वास और रोजगार के लिए किसी प्रभावी योजना की बात तो दूर हमें यह भी नहीं मालूम कि समाजों में इनकी जनसंख्या कितनी है

सांप छीन लिए और सुध नहीं ली

वन्यजीवों के संरक्षण पर सरकारें सख्त हुई तो सपेरे कानून की नजरों में अपराधी बन गए । हाथों से सांप सरके तो मानो सब कुछ लुट गया। पुरखों का पेशा मिट्टी में मिल गया और रोटी की जुगत कठिन हो गई । सपेरे कहते हैं अब हमे अपने बच्चो के जीवन निर्वाह की चिंता है। सरकार ने हमारे सांप तो छीन लिए पर हमारी सुध कभी नहीं ली । माना वन्यजीवों का संरक्षण अहम और सर्वमान्य निर्णय है परंतु इनके सहारे पेट पालने वाले परिवारों की जिम्मेदारी किसकी है?

मिले पारंपरिक रोजगार

सपेरों को अपने पुरखों के पेशे से विशेष लगाव है। विषैले से विषैले सर्प को पल भर में दबोच लेना सपेरों का खास शगल है । यदि इनकी इस पारंपरिक दक्षता का उपयोग वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो वन विभाग को अनेकों एक्सपर्ट स्नेक कैचर मिल सकते हैं । केरल जैसे राज्यों में तो चरणबद्ध कार्यशालाएं आयोजित कर सपेरों को वैज्ञानिक तरीके से सांप पकड़ने के गुर सिखाए जा रहे हैं इतना ही नहीं वन्यजीव विशेषज्ञों को भी इनके अनुभवों का लाभ मिल रहा है । शासन प्रशिक्षित सपेरों को वन मण्डलो, स्नेक पार्को तथा एंटी स्नेक वेनम बनाने वाली कंपनियों में नौकरी दे सकती है । इससे पर्यावरण का संतुलन तो होगा ही सर्पों की कई दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त होने से बच जाएंगी तथा सांप और सपेरा का पारंपरिक संबंध पुनर्जीवित हो उठेगा।

( ……✒️लेेखक.. नवभारत और दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैैं।……)

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