प्रकृति की नि:शुल्क देन की पहचान एवं संरक्षण आवश्यक

विभिन्न प्रकार के रोंगो की चिकित्सा में कारगर है जिले में पाई जाने वाली भाजियां

शहडोल। प्राकृतिक तौर हरे भरे जिले में कई प्रकार की औषधियाँ, जड़ी-बूटी और औषधीय गुणों से भरपूर साग, सब्जियों की पैदावार पाई जाती है, जिसकी पहचान करना सबके बस में नहीं है। शहडोल जिला आदिवासी बाहुल्य जिला है और आदिवासी अक्सर प्रकृति के बहुत करीब रहे हैं, यही कारण है कि प्रचलित साग-सब्जियों के साथ इन्हें उन वनस्पतियों का ज्ञान भी है, जिन्हें आप और हम नहीं जानते है या जो हमारे स्थानीय बाज़ार में नहीं मिलती है।

पौष्टिकता से भरपूर हैं ये भाजियां

सम्पूर्ण जिला आदिवासी बाहुल्य जिला है, आदिवासी समाज प्रकृति के बहुत करीब रहा है, इसीलिए प्रकृति के कई उपहारों की जानकारी उसे बड़े ही करीब से है। साल के 12 महीने अलग-अलग तरह की भाजियों को ये जंगलों, नदियों के किनारे, खेतों से चुनकर लाते हैं। साल में चार से पांच बार ऐसा भाजियां जरूर खाते हैं। आदिवासी समाज के लोगों की मानें तो यह भाजी खाने में स्वादिष्ट है। पौष्टिकता से भरपूर ये स्वयं उगने वाली भाजियां स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान होते हैं ।

जानिए इन भाजियों के बारे में

शाहपुर के किसान राजेंद्र शर्मा बताते हैं कि प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है, मैं प्रचलित खेती के साथ गेंदे का उत्पादन भी करता हूँ। हमारे साथ रहने वाले आदिवासियों को उन सभी साग-सब्जियों की भी पहचान है जो हम नहीं जानते हैं, जब मैंने इनका महत्व जाना तब से मैं भी इनकी पैदावार का प्रयास कर रहा हूँ। साल के 12 महीने हमें तरह-तरह की भाजी खाने को मिलती है। गांव के ही गोविंद सिंह बताते हैं कि कई भाजी बिना लगाए ही उग जाती है। चकौड़ा भाजी, कनकौआ भाजी, डोकरी भाजी, चेज भाजी, कजरा भाजी, लोनिया भाजी, पत्थरचट्टा भाजी, हुरहुरिया भाजी, गठबा भाजी, जंगली राई, और भथुआ भाजी को आजकल लोग अपने घर में भी लगाने लगे हैं, क्योंकि इन्हें बहुत ही पौष्टिक माना गया है। गोविंद सिंह को बताते हैं कि जो उनसे भी बुजुर्ग हैं और बहुत पुराने लोग हैं उन्हें और सारी भाजियों की जानकारी है आजकल के युवाओं को ये सब जानकारी नहीं है।

भाजियों में हैं प्रचुर ऊर्जा

कृषि वैज्ञानिक डा.ॅ मृगेंद्र सिंह कहते हैं कि आदिवासियों को प्रकृति का इतना ज्ञान इसलिए है, क्योंकि वह प्रकृति के सानिध्य में रहते थे. जिले का 40 प्रतिशत क्षेत्रफल वनाच्छादित है. जंगलों में या फिर पहले की जो खेती किसानी थी, वो भी उनकी प्रकृति पर ही निर्भर थी, उनका ये ज्ञान कोई एक दिन का नहीं बल्कि परंपरा से पीढिय़ों से मिला हुआ ज्ञान था, चकौड़ा, धान के खेत में होने वाली कजरा भाजी ऐसी चीजें हैं, जिनसे आदिवासियों को भरपूर मिनरल्स, प्रोटीन, विटामिंस, कैलोरी सब मिल जाता था और ये सभी प्रचुर ऊर्जा से परिपूर्ण है।

स्वयं उग जाती है ये भाजियां

सबसे बड़ी बात कि इन भाजियों की कोई खेती नहीं होती है। यह प्रकृति का दिया हुआ उपहार है। मतलब अपने समय में खुद से उग जाती हैं.लेकिन बदलते वक्त के साथ जो बदलाव हो रहे हैं, उसका असर इस पर भी देखने को मिल रहा है। वतमान में केमिकल युक्त खेती हो रही है और सबसे ज्यादा रासायनिक खाद इस्तेमाल किया जा रहा हैं, जिसके कारण भाजियां भी विलुप्त हो रही हैं। उनकी कोई खेती तो होती नहीं है। उनके दाने तैयार हो नहीं पाते हैं, जिससे वह पूरी तरह से विलुप्त हो रही है।

स्वास्थ्य के लिए लाभदायक

पुराने आदिवासियों का मानना है कि इनमें से कई भाजियां तो ऐसी हैं जो सेहत के लिए किसी आयुर्वेदिक दवा से कम नहीं हैं। इसलिए आदिवासी समाज के लोग साल में 5 से 6 बार उस भाजी को ढूंढ कर जरूर खाते हैं। अब बदलते वक्त का असर दिख रहा है. लोग अब धीरे-धीरे उन्हें खाना छोड़ रहे हैं। पहले जो आदिवासी समाज के लोग डॉक्टर के पास कम जाते थे, क्योंकि वो प्रकृति के ज्यादा नजदीक थे। इन भाजियों से त्वचा रोग, पथरी, शुगर जैसे रोगो में लाभ मिल रहा और अब चिकित्सक भी इन भाजियों के सेवन की बात कर रहे है।

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