कलई खुली तो, जिम्मेदारों ने जुटा दिये बेगुनाही के दस्तावेज! श्रीराम अस्पताल ने रेमडेसिविर काण्ड में फंसे कर्मचारी को किया बाहर 

 

आखिर सिविल सर्जन के तार देवांता में जाकर क्यों उलझते हैं?

20 दिनों तक नहीं पहुंचे थे नर्मदा एजेंसी में दस्तावेज 

इन्ट्रो-11 मई को पुलिस ने रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी से पर्दा उठाया, इस मामले में चार गिरफ्तार हुए, जांच अभी जारी है, इधर नर्मदा एजेंसी से सिविल सर्जन के कॉल पर देवांता भेजे गये इंजेक्शनों के दस्तावेज जुटा लिये गये हैं, वहीं श्रीराम अस्पताल ने इस खेल में जुड़े राजेश नामक कर्मचारी को बाहर का रास्ता दिखा दिया है

 

शहडोल। कोरोना महामारी के दौरान संजीवनी बनकर जिस रेमडेसिविर इंजेक्शन ने लाखों जिंदगियों को काल कवलित होने से बचा लिया, इन्हीं इंजेक्शनों की कालाबाजारी उसी मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा में लगा वहीं स्टॉफ कर रहा था, जिस पर संभाग के चारों जिलों के अलावा पूरे प्रदेश व देश को भरोसा था, पुलिस ने अपना फर्ज निभाते हुए मामले का भंडाफोड़ किया, इस मामले में चार को गिरफ्तार किया गया, जिन पर रासुका की कार्यवाही भी की गई, संभागायुक्त राजीव शर्मा के निर्देश के बाद मेडिकल कॉलेज के डीन ने तीनों कर्मचारियों को बर्खास्त भी कर दिया। हालाकि पुलिस अभी इस मामले की जांच में जुटी हुई है, आमजनों को उम्मीद है कि ऑपरेशन शंखनाद की तरह इस मामले में भी पुलिस तारों को जोड़ती हुई अन्य कई के चेहरे अभी बेनकाब कर सकती है, बहरहाल तथाकथित आरोपियों द्वारा इंजेक्शन चोरी करने के बाद जिनके माध्यम से बेचे गये और चोरी करने में जिन लोगों ने संरक्षण दिया था उनकी नींदे हराम हैं। रेमडेसिविर इंजेक्शन से जुड़ा निजी दवा दुकान संचालक के तार सिविल सर्जन से होते हुए एक बार फिर देवांता तक पहुंचे है, हालाकि पुलिस ने शायद इस मामले में जांच के दरवाजे बंद कर दिये हैं।

20 दिनों तक नहीं थे दस्तावेज!

शहडोल पुलिस ने रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी के तारो को जब खंगालना शुरू किया तो, तरह-तरह की चर्चाएं भी सामने आने लगी, मेडिकल कॉलेज से अलग नर्मदा एजेंसी नामक थोक दवा विक्रेता का नाम सामने आया, जांच में यह भी बातें सामने आई कि इन इंजेक्शनों के अधिकृत विक्रेता के द्वारा नियमों के तहत संधारित किये गये रिकार्डाे को पुलिस ने खंगाला तो, तीन से चार इंजेक्शनों का रिकार्ड नहीं मिला। फिर चर्चा यह आई कि दुकान मालिक संदीप चपरा ने यह बयान दिया कि संभवत: 20 अप्रैल को सिविल सर्जन डॉ. जी.एस. परिहार के मौखिक आदेश पर राजभान सिंह को यह इंजेक्शन दिये गये। 11 मई को जब पुलिस ने यहां के दस्तावेज खंगाले तो, रिकार्ड अधूरा मिला, लेकिन बाद में यह रिकार्ड चंद घंटो या दिनों में पूरा हो गया, जिसको लेकर दवा दुकान के संचालक के साथ सिविल सर्जन, देवांता अस्पताल और जांच अधिकारी पर आमजन उंगलिया उठाने लगे।

खुलासे के बाद जुटाये दस्तावेज 

दवा दुकान से सिविल सर्जन के मौखिक आदेश दिये गये इंजेक्शनों के मामले में पड़ताल के दौरान यह बातें सामने आई कि 20 अप्रैल को मौखिक आदेश पर इंजेक्शन दिये गये थे, 11 मई को पुलिस ने कार्यवाही की, बीच के इन 20 दिनों में कोई दस्तावेज नहीं भेजे गये थे, संभवत: इसी कारण इस पर सवाल उठे, लेकिन सवाल उठने के कुछ घंटो या दिनों में नई कहानी सामने आई कि देवांता अस्पताल में कैलाश सिंह नाम के मरीज भर्ती थे, जिन्हें अस्पताल ने रेमडेसिविर लगाने का परामर्श दिया था, 19 अप्रैल को 2 इंजेक्शन संभवत: सिविल सर्जन के मार्फत रेडक्रास सोसायटी से दिये गये, अगले दिन रेडक्रास में इंजेक्शन न होने का हवाला देकर चार इंजेक्शन महज फोन कॉल पर उपलब्ध करा दिये गये। सवाल यह है कि रेमडेसिविर को लेकर बनी गाइडलाईन का पालन क्यों नहीं हुआ, जिन्हें जिला अस्पताल और रेडक्रास में रखे गये इंजेक्शनों की पहरेदारी और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई, उन्होंने गाइडलाईन को दरकिनार क्यों किया, यहीं नहीं आवश्यकता पर यदि इंजेक्शन उपलब्ध कराये तो, 20 दिनों तक दस्तावेज क्यों नहीं दिये, बहरहाल यह चर्चा जांच के बाद ही पुष्ट हो सकती है।

इधर श्रीराम ने किया दागी को बाहर 

शहडोल में रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी का आलम यह था कि इसकी गूंज सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियों के कानों को छोड़कर हर कहीं गुंजायमान थी। पुलिस ने जिस दीपक नामक युवक को इस मामले में गिरफ्तार किया है, पड़ताल के दौरान यह जानकारी सामने आई कि श्रीराम चिकित्सालय में लगभग एक दशक से अपनी सेवाएं दे रहे, अस्पताल के मुख्य कर्ता-धर्ता राजेश दुबे भी इस खेल में शामिल थे और उन्होंने उत्तरप्रदेश के कानुपर स्थित नारायण अस्पताल में भर्ती मरीज विजय कुमार को शहडोल से इंजेक्शन उपलब्ध कराये थे। यह बातें भी सामने आई कि राजेश दुबे ने विजय कुमार के दूर के रिश्तेदार हिमाशु अवतानी को दीपक से 10-10 हजार रूपये में चार इंजेक्शन दिलवाये थे, खुद हिमांशु ने इस बात की पुष्टि की है। हालाकि 11 मई को ही जब पुलिस इस मामले से पर्दा उठा रही थी, उस दौरान 4 इंजेक्शन लगने के बाद भी विजय कुमार की मौत हो गई। इधर श्रीराम अस्पताल के संचालक डॉ. विजय दुबे ने बताया कि जब उन्हें राजेश दुबे के इस मामले में संलिप्त होने की जानकारी लगी तो, उसे अस्पताल से निकाल दिया गया है। हालाकि पुलिस ने अभी तक जांच के दौरान राजेश दुबे तथा अन्य को मुख्य या सह आरोपियों में शामिल नहीं किया है।

इनका कहना है…

इस मामले में अभी जांच की जा रही है, नर्मदा एजेंसी और राजेश दुबे के बिन्दुओं को भी जांच में शामिल कर ले रहे हैं।

अवधेश गोस्वामी

पुलिस अधीक्षक, शहडोल

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